श्री श्रृंगीऋषि चालीसा
लेखक पुनीतराम गुरुवंश, हरिद्वार
दोहा करू विभांडक पुत्र को सुमिरण बारम्बार ।
हाथ जो विनती करू प्रभु हैं एक आधार ।।
ऋषिमुनि का जो स्थान है, वह सुन्दर वरदान |
शांता श्रृंगी का वहां निशदिन हो गुणगान ।।
चौपाई
जय-जय श्रृंगीऋषि अविनाशी, करो कृपा गुरूदेव प्रकाशी ।।
प्रेम से कहो कर्णेश्वर धामा, पुरण हो जाय हर कामा ॥
जहाँ सप्तऋषि गण हैं बसते, वहाँ देवता सब हैं रमते ।।
अति सुन्दर पर्वत चहूँ ओरा, पक्षी करते कलरव भोरा ।।
फैली सभी जगह हरियाली, खिले फुल अब डाली डाली ।।
निर्मल नीर नदी से बहता, अर्ध निशा कल कल ह करता ।।
नाम तुम्हारा जो कोई गावै, जनम जनम के दुख बिसरावै ।।
ब्रम्हा के मानस सुत कश्यप, जो करते हैं नित्य यहाँ तप ।।
ऋषि विभांडक घोर तपस्वी, जैसे थे और शिवि दधिचि ।।
वह तप देख देव घबराये, भंग हेतु उर्वशी पठाये ।।
जल में बैठे करे तपस्या, तभी आ गई बड़ी समस्या ||
शक्ति हुई लखते ही क्षीना, यू ऋषि पुत्र जगत को दीना ॥
ऋष्य श्रृंग का नाम करण था, उस दिन फिर तप का किया वरण था ।।
माँ समान करते थे पोषण, काम क्रोध का करके शोषण ।।
वह ऋषि हुए मनीषी पंडित, जिनकी वाणी कभी न खण्डिता ।।
चर्चा फैली देश विदेशा, नाम मात्र से रहे न क्लेशा ||
वल्कल मृग छाला अति सोहे. धूनी रमा गुफा की खोहे ।।
गल रूद्राक्ष जटा सिर घारी, श्रृंग मुकुट मोहे हर बारी ।।
लम्बी भुजा वक्ष अति भारी, देह गठीली चौड़ी छाती ।।
पाव खडाऊ गौर शरीरा, चमके भाल कि जैसे हीरा ।।
उनसे बनी महानदी गाथा, छत्तीसगढ़ से जोड़ा नाता ।।
महानदी विख्यात कर्णेश्वर, रहते वहाँ सदा शिवशंकर ।।
चित्रोत्पला गंगा की धारा, उनकी लीला अपरम्पारा ||
पिता कंठ जब विषधर देखे, फिर न क्रोध से लेखे जोखे ।
शाप दिया उसको अति भारी, जिससे जीवन हुआ दुखारी ।।
वह सप्तम दिन ही मृत होगा, जीवित फिर न परीक्षित होगा ।
अग देश तप किया समीपा, रोम पाद थे वहाँ महीपा ।।
अंग देश में पड़ा अकाला, बचा न था एक भी निवाला ।।
मंत्री प्रजा सभी थे व्याकुल, धन सम्पदा बची न माकुल ।।
राज सभा में हुआ विमर्शा, आए श्रृंग तभी हो वर्षा ।।
सुनो प्रभु अब अरज हमारी, कृपा सिंधु योगी ब्रम्हचारी ।।
कभी नहीं देखी थी नारी, बड़ी समस्या थी यह भारी ।।
देव दासी का रूप संवारा, देख जिसे तन मन था हारा ।।
अंग देश यू ऋषिवर आए, रहे वहीं निज वेष बनाए ।।
छाया राज्य बीच उल्लासा, होने लगा संत का वासा ।।
रोम पाद तनुजा शाँता नामा, सती सादगी रूप ललामा ।।
रोम पाद ऋषि से भयभीता, सुता सौंप कर था निज हीता ।।
श्रृंगीऋषि वशिष्ठ बुलाये, अवध पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाये ।।
अश्वमेघ भी वहाँ थे किये, दोनों वहीं समाधि थे लिये ।।
ऋषि मुनि संत हाएं प्रख्याता, युगों युगों तक है विख्याता ।।
दोहा :
अगम अगोचर प्रभु तुम पारब्रम्ह अवतार |
शीश जटा धूनी रमा है, विभूति अवतार ।।
सिद्ध पुरुष करके कृपा, दो मुझको उपदेश ।
निश दिन मैं सेवा करुँ, सुबह शाम आदेश ।।
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