महानदी उद्गम की कथा
पतित पावनी गंगा माई के जल से प्रवाहित होने वाली जल धारा ही महानदी गंगा कहलायी है। भौगोलिक दृष्टि कोण से यदि देखें तो किसी नदी का उद्भव किसी पहाड़ से या जंगल से एक छोटी सकरी नाली नुमा जल प्रवाह धीरे-धीरे एक नदी का बड़ा प्रवाह बनाती है।
परन्तु महानदी का उद्भव अन्य नदियों से भिन्न है जो महर्षि श्रृंगी ऋषि पर्वत से निकलकर पूर्व दिशा की ओर बहना शुरू की और लगभग 15 या 16 कि.मी आगे बढ़ने के पश्चात् (फरसिया ग्राम) पुनः वापस हुई है। आज भी यह दृश्य बालका और महानदी के संगम पर बरसात के प्रथम बाद में देखने को मिलता है।
कथाकारों का कहना और इस क्षेत्र में यह किवदंती है कि एक बार प्रयाग में कुंभ मेला के लिये इस क्षेत्र के सभी ऋषि कुंभ स्नान के लिये जाने लगे, ऋषियों ने सोचा कि चलो साथ में महर्षि श्रृंगी ऋषि को साथ में ले चलते हैं। ऋषि गण जब श्रृंगी ऋषि के आश्रम में पहुंचे तो महर्षि जी तपस्या में ध्यानस्थ थे तब ऋषियों ने बिना विघ्न डाले कुंभ स्नान के लिये चल दिये और लौटते वक्त अपने अपने कमंडलु में गंगा जल भर लाये और जब महर्षि श्रृंगी ऋषि आश्रम में पहुंचे तब श्री श्रृंगी ऋषि तपस्या में रत थे।
तब सभी ऋषि ने अपने अपने कमंडलु का गंगा जल थोड़ा थोड़ा श्रृंगी ऋषि के कमंडलु में डाल कर अपने आश्रम को चले गये।
बहुत वर्ष बीत गया फिर भी श्रृंगी ऋषि का ध्यान नहीं टुटा महर्षि श्रृंगी ऋषि के तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा मैया कमडलु से प्रकट हो गयी और कमडलु लुड़क गया, गंगा मैया ने श्रृंगी ऋषि को वरदान माँगने को कहा परंतु ऋषि जी का ध्यान नहीं टुटा इस पर गंगा मैया बड़ी क्रोधित होकर पहाड़ को छेदकर बड़े वेग के साथ पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित होने लगी आज भी वह बड़ा छेद विद्यमान है जिससे धन जन को हानि होने लगी। इस स्थिति में महर्षि श्रृंगी ऋषि के शिष्य महानंदा ने सोचा कि गंगा मैया अनेको जीवधारियों को बहा ले जाएगी। उनके मरने से पाप मेरे गुरुदेव को लगेगा यह सोच कर शिष्य महानंदा ने अग्नि जलाकर महर्षि श्रृंगी ऋषि के शरीर में डाल दिया जिससे उनका ध्यान टूट गया और अत्यंत क्रोध मुद्रा में महानंदा की ओर देखा उनके क्रोधित नेत्र ज्योति से महानंदा वहीं पर चलकर भस्म हो गया। जब ऋषि से ध्यान लगाकर सभी रहस्य का पता चला तब तक गंगा मैया बहुत दूर (लगभग 15 से 16 कि.मी.) तक चली गयी थी। महर्षि जी ने गंगा मैया से प्रार्थना की कि हे गंगा मैया आप वापस आइए और पूर्व दिशा को छोड़कर गंगा मैया वापस आकर क्रोधित मुद्रा में श्रृंगी ऋषि पर्वत को तोड़ना चाही तब श्रृंगी ऋषि पुनः प्रार्थना किये कि हे गंगा मैया आप शांत हो जाएं और शाति पूर्वक दक्षिण दिशा से होकर पश्चिम होते हुए उत्तर पूर्व दिशा में जाए ताकि चारों दिशाओं में घूमते जन कल्याण करते हुए आपके साथ मेरा और मेरे शिष्य का नाम उज्जवल कीजिए, गंगा मैया तो महामाया है अपने भक्तों के करूण प्रार्थना को स्वीकार कर महामाया गया शांत हो गई। और महर्षि बगी ऋषि के कथनानुसार प्रवाहित हुई और महामाया गंगा श्रृंगी ऋषि को आर्शीवाद देते हुए कि हे महर्षि तुम्हारे शिष्य महानंदा ने तुम्हारी गुरु सेवा में जो बलिदान दिया है वह सराहनीय है। अतः मे जहां तक जाऊंगी तुम्हारे शिष्य के नाम की नदी कहलाऊंगी। ऐसा आर्शीवाद देकर महामाया गंगा महानंदा के नाम से महानदी बनकर पुरे छत्तीसगढ़ क्या बंगाल की खाड़ी तक जीवनदायिनी नदी बनकर प्रवाहित हुई।
महानदी के नाम -
नामकरण करने वाले ऋषि 2 वित्रोत्पल्ला गंगा श्रृंगी ऋषि (गणेश घाट के पास) -कर्क ऋषि (कर्कऋषि आश्रम के पास) 5. तिरोपल्ला कंक ऋषि दुधावा बाँध के नीचे) 7. जागृति गंगा -भगवान भृगु
नाम
1. महानदी -श्रृंगी ऋषि (फरसियों से मोदे तक)
3. कनक नंदा
4. नीलोत्पल्ला -दधिचि मुनि (गणेश घाट से नीचे)
6. ज्योति गया -भगवान भृगु
8. महानंदा (कर्णेश्वर के पास)
9. पार्वतीश्वरी (पैरी नदी के पास)
10. कुलेश्वरी (राजिम के पास)
11. ऋषितुलजा
12 मकरवाहनी 13. उत्पलेश्वरी 14. फर्णीश्वरी
15. पाटेश्वरी
16. विष्णुपादसेवनी - हरिवंश पुराण
ॐ महानदी नमः
श्लोक:- 1.
ॐ महानदी शतमुखी, शुक्ला मकरवाहिनी। ब्रम्ह हस्तात् परिभ्रष्टा, सौम्य रूपेण शोभना।। - सात मुख से उत्पन्न, मकर वाहिनी, जो ब्रम्हा के कमण्डल से उत्पन्न, जिसका स्वभाव सौम्य रूप है ऐसे पवित्र निर्मल चित्रोत्पला गंगा का नमन करता हूँ।
श्लोक: 2.
ऊँनमदा, सुरसा शोणा, दशांणां च महानदी मन्दाकिनी चित्रकूटा।
तामसी पिशाचक्र चित्रोत्पला, विपाश्च मंजुला बालवाहिनी।।
ऋक्षवज्पादजा नथ सर्व पापहरा नृणाम्तापी पयोष्णी ।
शीघ्रोदा च वेच्या वैतरणी चैव बालका कुमुदनी
महानदी का एक नाम चित्रोत्पला है इसे कंक ऋषि की पुत्री होने के कारण कंकणी नाम से भी जाना जाता है।
श्लोक:- 3.
ॐ ऋषि कुल्यां समा सादय दक्षिणोदधि गामनीत ।
स्वर्ण रेखा महानदयो मध्य देशः प्रतिष्ठित ।।
मारकण्डेय पुराण (57-29) तथा वायु पुराण (45–107) में सुक्तिमत पर्वत से उद्गम महानदी को मन्दवाहिनी कहा गया है।
श्लोक:- 4.
ॐ ऋषि कन्या कुमारी च मन्दगामिनी ।
कृपापलाशिनी चैव शुक्ति मत्प्रभवास्मृता ।।
प्रस्तुत श्लोक में ऋषि कन्या के साथ कुमारी शब्द का प्रयोग किया गया है। संभव है नर्मदा नदी को कुंवारी नदी मानते हैं ठीक इसी प्रकार महानदी को कुवारी नदी कहने में अतिसंयोक्ति नहीं हैं। महानदी का वर्णन कल्पद्रुम के तृतीय भाग पृ.600 में महानदी को पुरुषोत्तम क्षेत्र के अन्तर्गत बताया गया है। इसमें भी महानदी का नाम चित्रात्यला कहा गया है।
भगवान राजीव लोचन का क्षेत्र राजीम को पुरुषोत्तम कमल क्षेत्र के नाम से आज भी जाना जाता है। राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों में महानदी के महत्वों को वर्णन किया गया है:
महानदी का विस्तृत वर्णन मिलता है जैसे: महानदी तुंग-तरंग भंग, स्फारोच्छलच्छी करवदिमरासत । वस्मिनरता सिक्त मदागनाना। श्रमापनोद क्रियते मरू. दिभः ।। इस प्रकार महानदी का महात्य वेदों पुराणों के अलावा शिला लेख गुहाभिलेखों के साथ राजाओं के ताम्रपत्रों में विस्तार से मिलता है।
श्लोक-
सेयं महानदी गंगा साक्षाद् विष्णु पदोद्भवा ।
ऋष्य श्रृंगेण चानीता कलिपाप विनाशिनी।। (वही 3 / 81-83)
श्लोक:
महानदी सरिद यस्याभ्याशे राजीव चक्षुषः ।
पुण्यारण्यापरं विद्धि भक्ति स्थान सुदुर्लभम् ।।
श्लोक:-
राजीव नगरे रम्ये तटे नद्या महेश्वरः ।
उत्पलेश्वर नामस्ते भवान्या सहितो विभुः ।।
तीर्थराज समा विद्धि कलौ चित्रोत्पला नदीम्।
गंगा चित्रोत्पला ख्याता महापातक नाशिनी (वही 7/1-11)
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